जब सीता लिम्बू के पति को अचानक दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया, तो उनकी ज़िंदगी जैसे रुक-सी गई। “उस पल मुझे लगा कि मैंने सब कुछ खो दिया है,” वह याद करती हैं। उनकी बड़ी बेटी, जो कोलकाता में कॉलेज में पढ़ रही थी, ये खबर सुनते ही रोते हुए घर लौट आई।
शोक असहनीय था। सीता ने अपने दुख को बेटियों से छिपाया, लेकिन अंदर से वह टूटी और डरी हुई थीं। उनकी तबीयत भी बिगड़ने लगी और वह सोचने लगीं, अगर मैं अब मर गई, तो मेरी बेटियों का क्या होगा?
अपने सबसे कठिन समय में, सीता ने अपनी पड़ोसी से एक पादरी को बुलाने के लिए कहा। पादरी आए, उनके साथ प्रार्थना की और उन्हें अस्पताल भी लेकर गए। उसी क्षण से उनकी चंगाई की यात्रा शुरू हुई।
विश्वास में शक्ति पाना
सीता ने बाइबल पढ़ना शुरू किया और उसके वचनों को अपने परिवार के जीवन पर घोषित करने लगीं। वह प्रार्थना करतीं, “आप मेरी बेटियों के पिता हैं; आप ही हमारे लिए सब कुछ हैं।” वह कहती हैं कि परमेश्वर की उपस्थिति ने उनके जीवन की खालीपन को भर दिया।
उन्होंने यह घोषणा करते हुए साहस पाया — “मेरा शांति, मेरी शक्ति — प्रभु हैं। परमेश्वर ने मुझे यह समझने में मदद की कि मेरा डर मसीह के साथ क्रूस पर चढ़ाया गया।” जैसे-जैसे वह प्रार्थना करतीं और वचन पढ़तीं, वह भय जो कभी उनके जीवन पर हावी था, धीरे-धीरे मिट गया।
डर और चिंता पर विजय
सीता की बड़ी बेटी, सुजाता, भी कोलकाता में पढ़ाई करते हुए विश्वास में बढ़ने लगी। वह ऑनलाइन कलीसिया में जातीं और बाइबल पढ़तीं, जिससे उन्हें भी परमेश्वर पर निर्भर रहना सीखने को मिला। दोनों ने मिलकर भय की जगह आशा को अपनाना शुरू किया।
सीता कहती हैं, “पहले मैं अपने परिवार और भविष्य के लिए चिंतित रहती थी और डर में जीती थी। आज मैं उससे ऊपर उठ चुकी हूँ। मेरी शांति, मेरी शक्ति — प्रभु हैं।”
आशा का संदेश
सीता की यात्रा हमें याद दिलाती है कि मानसिक और भावनात्मक चंगाई में समय लगता है, लेकिन यह एक छोटे से कदम से शुरू होती है — मदद मांगने, प्रार्थना करने और परमेश्वर पर भरोसा करने से। उनकी कहानी दिखाती है कि गहरे दुख के बीच भी विश्वास से शांति और नई शक्ति प्राप्त की जा सकती है।
जो भी आज टूटे दिल के साथ जी रहा है, वह याद रखे — चंगाई संभव है। विश्वास, प्रार्थना और दूसरों के सहारे से शांति फिर लौट सकती है — भले ही जीवन ने बहुत कुछ छीन लिया हो।









